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Showing posts from August, 2018

एक विशेष आग्रह

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बाल विकास के स्वर्णिम सूत्र (एक मनोवैज्ञानिक लेख)

             मनुष्य,  सृष्टि कर्ता की एक उत्कृष्ट कृति है।  मनुष्य जैसी बौद्धिक क्षमता किसी अन्य जीव ,जन्तु, पशु पक्षी आदि में नहीं पायी जाती।  हम चिड़िया, मछली, घोड़ा आदि की भांति उड़ने तैरने व् दौडने में असमर्थ है।  परन्तु हमारी बौद्धिक क्षमता ने हमें उड़ना, तैरना, भागना सभी में माहिर कर दिया। गाय का बछड़ा जन्म लेने के तुरंत बाद ही चलना प्रारम्भ कर देता है, बन्दर के बच्चे को छलांग लगाने के लिए किसी संस्थान से प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता नहीं होती, बिल्ली, शेर, चीता, रीछ आदि के बच्चे जन्म जात ही शिकारी होते है।              लेकिन मनुष्य के बालक में तो इतना ज्ञान भी नहीं होता की वो साथ में लेटी अपनी माँ का स्तन पान भी स्वयं कर ले ,आदमी का बच्चा तो बस रोना जनता है।  वह  न तो खुद उठ बैठ सकता है और न ही चल फिर सकता है। उसे तो बोल, चाल, खान, पान, रहन, सहन सब कुछ सिखाना ही पड़ता है।           क्योंकि प्रकृति ने यह सुविधा केवल मनुष्...