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किसी ने क्या खूब लिखा है लिखने वाले ने , " सोते तो तब थे जब माँ सुलाती थी , अब तो बस थक कर गिर जाता हु। आज की जिंदगी को देख कर हसी आती है क्या इसी का नाम जीवन है , क्या यही सब करना ही हमारा उद्देश्य है। या हम अपने मार्ग से भटक गए है। अपनी दिन चर्या के अनुरूप अपने आप से पूछिए , कि जो हमारी जीवन शैली है, क्या इसी का नाम जीवन है, जवाब में न ही मिलेगा। जिसका एक मात्र कारण समय का अभाव है घर में खुशिओं का सब साजोसामान इकक्ठा कर लिया और परिवार के साथ बैठ कर हसने का वक्त नहीं। आधुनिकता की अंधी दौड़ में भागते भागते हमारे संस्कार, हमारी विद्या , हमारे परिवार , स्वास्थ्य , सुख, चैन सभी कुछ तो चला गया सकून से रहने के चक्कर में लेकिन सकूं तो क्या हमारी तो नींद भी चली गयी यदि हाथ में कुछ आया भी तो संस्कारो की जगह आधुनिकता, विद्या की जगह शिक्षा, घर की जगह मकान और स्वास्थ्य का स्थान मेडिकल पॉलिसी ने ले लिया। मकान के साथ साथ दिल भी छोटे हो गए विचार भी दूषित हो गए जिसका...
आज प्रायः समाज का हर व्यक्ति अपनी सन्तान के भविष्य की चिंता से ग्रस्त है। बच्चों की शिक्षा उनका रहन सहन उन की सोसायटी खान पान आदि आदि। जितना बड़ा नगर उतनी बड़ी चिंता, अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए माता पिता दोनों एड़ी छोटी का ज़ोर लगा रहें है। मैने यहाँ तक देखा है कि पिता का पूरा वेतन बच्चो की शिक्षा पर खर्च होता है और माँ की सेलरी से घर और बाकी खर्च पूरे होते है। ऐसी मिसालें महानगरों में भरी पड़ी है। आधुनिकता की अंधी भागम भाग जो बच्चों के लिए ही हो रही है उन के पास उनके लिए ही वक़्त नहीं है घर में खुशियों का सब साजो सामान सजा कर बैठ गए और हसने के लिए वक़्त नहीं। बच्चे शिक्षित तो हो रहे है, मगर विद्या वान नहीं। ज़रा सी बरसात क्या हो गयी इमारतें गिरने लगी क्या इन को बनाने वाले इंजीनियर नहीं थे, अनपढ़ थे क्या वो शिक्षित नहीं थे जो वो बता पाते कि बिल्डिंग में कितना सरिया और कितना सीमेंट लगेगा।...
मनुष्य, सृष्टि कर्ता की एक उत्कृष्ट कृति है। मनुष्य जैसी बौद्धिक क्षमता किसी अन्य जीव ,जन्तु, पशु पक्षी आदि में नहीं पायी जाती। हम चिड़िया, मछली, घोड़ा आदि की भांति उड़ने तैरने व् दौडने में असमर्थ है। परन्तु हमारी बौद्धिक क्षमता ने हमें उड़ना, तैरना, भागना सभी में माहिर कर दिया। गाय का बछड़ा जन्म लेने के तुरंत बाद ही चलना प्रारम्भ कर देता है, बन्दर के बच्चे को छलांग लगाने के लिए किसी संस्थान से प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता नहीं होती, बिल्ली, शेर, चीता, रीछ आदि के बच्चे जन्म जात ही शिकारी होते है। लेकिन मनुष्य के बालक में तो इतना ज्ञान भी नहीं होता की वो साथ में लेटी अपनी माँ का स्तन पान भी स्वयं कर ले ,आदमी का बच्चा तो बस रोना जनता है। वह न तो खुद उठ बैठ सकता है और न ही चल फिर सकता है। उसे तो बोल, चाल, खान, पान, रहन, सहन सब कुछ सिखाना ही पड़ता है। क्योंकि प्रकृति ने यह सुविधा केवल मनुष्...
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