बालकों का भावनात्मक विकास करें
आज प्रायः समाज का हर व्यक्ति अपनी सन्तान के भविष्य की चिंता से ग्रस्त है। बच्चों की शिक्षा उनका रहन सहन उन की सोसायटी खान पान आदि आदि। जितना बड़ा नगर उतनी बड़ी चिंता, अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए माता पिता दोनों एड़ी छोटी का ज़ोर लगा रहें है। मैने यहाँ तक देखा है कि पिता का पूरा वेतन बच्चो की शिक्षा पर खर्च होता है और माँ की सेलरी से घर और बाकी खर्च पूरे होते है। ऐसी मिसालें महानगरों में भरी पड़ी है।
आधुनिकता की अंधी भागम भाग जो बच्चों के लिए ही हो रही है उन के पास उनके लिए ही वक़्त नहीं है घर में खुशियों का सब साजो सामान सजा कर बैठ गए और हसने के लिए वक़्त नहीं। बच्चे शिक्षित तो हो रहे है, मगर विद्या वान नहीं। ज़रा सी बरसात क्या हो गयी इमारतें गिरने लगी क्या इन को बनाने वाले इंजीनियर नहीं थे, अनपढ़ थे क्या वो शिक्षित नहीं थे जो वो बता पाते कि बिल्डिंग में कितना सरिया और कितना सीमेंट लगेगा। जी नहीं उन को मालूम था क्यों कि उन को केवल रुपया कमाना था जो शिक्षा ने सिखाया यदि उन के पास विद्या होती तो शायद वो बेक़सूर मासूमों की जिन्दगी से न खेलते। इतने बेगुनाह न बे मौत न मारे जाते।
क्या आप ने कभी सोचा कि आज जितनी तेज़ गति से डॉक्टर , इंजीनियर, आदि बन रहे है उतनी ही गति से स्वामी विवेकानंद, विनोबा भावे , अब्दुल हमीद , सी वी रमण , मीरा बाई ,रसख़ान सरदार पटेल आदि क्यों नहीं बन रहे कहा लुप्त हो गए सब। ये लोग पैदा होने क्यों बंद हो गये। क्यों की आज हमारे घरों से संस्कार गायब हो गये। इसका एक ही कारण है की हमारा सारा ध्यान बालकों के बौद्धिक विकास पर जा कर रुक गया है और भावनात्मक विकास की और हम देख भी नहीं रहे है।
मनुष्य की भाव संवेदनाओ को भावनातमकता कहते है जो एक नेक दिल इन्सान में होनी चाहिए एक अचछे माता पिता होने के कारण हमारा ये दायित्व बनता है की हम अपनी संतान के रूप में राष्ट्र को कैसी संतान दे रहे है। रामायण काल में राक्षसों के पास बौद्धिक ज्ञान प्रचुर मात्रा में था यदि भावनात्मक ज्ञान होता तो शायद बात कुछ और होती। उस समय का राक्षस पेड़ खा जाया करता था पूरी नदी पी जाता था आज का राक्षस सडको का तारकोल घोटाले कर के खा जाता है, सरिया सीमेंट पत्थर बालु मिट्टी सब खा जाता है क्यों की भावनात्मक विकास नहीं है। वृद्धआश्रमो में रहने वाले अधिकांशतः बुजुर्ग शिक्षित परिवारों से ही है। मरीज़ो को दुर्व्यसनो से दूर रहने की सलाह देने वाले चिकित्सक अक्सर खुद ही इनके ग़ुलाम देखे जाते है। क्यों की शिक्षा तो है, परन्तु विद्या नहीं इसी लिए यदि जीवनोपार्जन के लिए बौद्धिक ज्ञान जरुरी है तो आत्मिक व् पारिवारिक के साथ साथ सामजिक हित के लिए बालको का भावनात्मक विकास भी जरुरी है।
बालकों का भावनात्मक विकास कैसे करें आगमी अंक में। ......
आधुनिकता की अंधी भागम भाग जो बच्चों के लिए ही हो रही है उन के पास उनके लिए ही वक़्त नहीं है घर में खुशियों का सब साजो सामान सजा कर बैठ गए और हसने के लिए वक़्त नहीं। बच्चे शिक्षित तो हो रहे है, मगर विद्या वान नहीं। ज़रा सी बरसात क्या हो गयी इमारतें गिरने लगी क्या इन को बनाने वाले इंजीनियर नहीं थे, अनपढ़ थे क्या वो शिक्षित नहीं थे जो वो बता पाते कि बिल्डिंग में कितना सरिया और कितना सीमेंट लगेगा। जी नहीं उन को मालूम था क्यों कि उन को केवल रुपया कमाना था जो शिक्षा ने सिखाया यदि उन के पास विद्या होती तो शायद वो बेक़सूर मासूमों की जिन्दगी से न खेलते। इतने बेगुनाह न बे मौत न मारे जाते।
क्या आप ने कभी सोचा कि आज जितनी तेज़ गति से डॉक्टर , इंजीनियर, आदि बन रहे है उतनी ही गति से स्वामी विवेकानंद, विनोबा भावे , अब्दुल हमीद , सी वी रमण , मीरा बाई ,रसख़ान सरदार पटेल आदि क्यों नहीं बन रहे कहा लुप्त हो गए सब। ये लोग पैदा होने क्यों बंद हो गये। क्यों की आज हमारे घरों से संस्कार गायब हो गये। इसका एक ही कारण है की हमारा सारा ध्यान बालकों के बौद्धिक विकास पर जा कर रुक गया है और भावनात्मक विकास की और हम देख भी नहीं रहे है।
मनुष्य की भाव संवेदनाओ को भावनातमकता कहते है जो एक नेक दिल इन्सान में होनी चाहिए एक अचछे माता पिता होने के कारण हमारा ये दायित्व बनता है की हम अपनी संतान के रूप में राष्ट्र को कैसी संतान दे रहे है। रामायण काल में राक्षसों के पास बौद्धिक ज्ञान प्रचुर मात्रा में था यदि भावनात्मक ज्ञान होता तो शायद बात कुछ और होती। उस समय का राक्षस पेड़ खा जाया करता था पूरी नदी पी जाता था आज का राक्षस सडको का तारकोल घोटाले कर के खा जाता है, सरिया सीमेंट पत्थर बालु मिट्टी सब खा जाता है क्यों की भावनात्मक विकास नहीं है। वृद्धआश्रमो में रहने वाले अधिकांशतः बुजुर्ग शिक्षित परिवारों से ही है। मरीज़ो को दुर्व्यसनो से दूर रहने की सलाह देने वाले चिकित्सक अक्सर खुद ही इनके ग़ुलाम देखे जाते है। क्यों की शिक्षा तो है, परन्तु विद्या नहीं इसी लिए यदि जीवनोपार्जन के लिए बौद्धिक ज्ञान जरुरी है तो आत्मिक व् पारिवारिक के साथ साथ सामजिक हित के लिए बालको का भावनात्मक विकास भी जरुरी है।
बालकों का भावनात्मक विकास कैसे करें आगमी अंक में। ......
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