असीमसे जुड़े, अल्प से नहीं


                         हमारा उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचना नहीं बल्कि ठेस लगने से बचाना है।  यह  लेख किसी के व्यक्तिगत जीवन पर आधारित नहीं है लेखक के स्वतंत्र विचार है।  यदि यह लेख किसी की व्यक्तिगत जीवन से मेल खाता है तो यह केवल एक संयोग ही है।
                       कई दिनों से एक दर्द ले कर घूम रहा था, भक्ति में डूबे, गुरुभक्ति, प्रभु भक्ति से लबा लब भरे लोगो को देख कर कभी कभी हसी के साथ में गहरी सोच में डूब कर जाता हूँ। कि समाज में किस बेहरहमी के साथ इन तथा कथितआश्रम रूपी कत्लखानो में लोगो की श्रद्धा, निष्ठा, विश्वास का गोरख धंधा चल रहा है।  इन बेचारे अन्ध भक्तो का क्या होगा इन को सही मार्ग कौन सुझाएगा  ? जो मार्ग बताने वाला है, वो ही इन को पथ भ्रष्ट करने में लगा है।  पता तो तब चलता है , जब विश्व विख्यात फलां फलां ......जी कुख्यात बन जाते है तब समझ में आता है, की मेने ये क्या किया, यदि आप का आध्यात्मिक स्तर सही से विकसित है, तो आप सम्भल  जायेंगे, वरना कभी कभी  इतना करीब और आगे जा कर धोखा खा लेने के बाद सम्भलना बहुत मुश्किल भी हो जाता है।  क्यों कि लोग इतने श्रद्धावान होते है, की वो भाव विह्वल हो कर किसी के ज्ञान और किसी के गायन से आकर्षित या प्रभावित हो कर अपनी मंज़िल उसी को मान बैठते है। 
                             वास्तव में लोग अपनी श्रद्धा निष्ठा के फलस्वरूप ये भूल ही जाते है कि यह इनका पेशा है भक्ति नहीं।  हम केवल बहरी रंग, रूप, रहन, सहन , पहनावा आदि देख कर इन को गुरु आदि मान बैठते है।  इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि हम लोग दिल से सोचते है और जो कुछ भी देखते है, श्रद्धा के चश्में से देखते है,  उस वक़्त हम यह भूल जाते है, कि इस कथा वाचक या भजन गायक का जीवन भी हमारे जैसा ही है इन के भी हमारे जैसे घर परिवार है और परिवारों के खर्च हमारे जैसे ही नहीं हम से कही ज्यादा इन के खर्च है
इन को भी अपने बच्चों को स्कूल कॉलिज भेजना है।  इन के बच्चे को भी कोई न कोई अच्छी जॉब या व्यापर करना चाहते है।  ठीक वैसे ही जैसे हमारे बच्चे या हम अपने परिवार के लिए सोचते है लेकिन हम अपने काल्पनिक जगत में एक ऐसे सदगुरु की कल्पना कर बैठते है जैसा हमने शास्त्रों में पढ़ा। हम यह भी भूल जाते है कि यह सज्जन भी हमारी तरह ही सांसारिक है, भोग विलासी है, पारिवारिक होने के साथ साथ सामाजिक भी है  इन का जीवन भी हमारी तरह ही है यह भी वैसे ही जीते है जैसे हम 
हम अपनी कल्पनाओं में अपनी मंज़िल को ढूँढ़ते है और अज्ञानता वश इन को अपनी मंज़िल मान कर अपने सफर की इतिश्री कर बैठते है।  कुछ समय ठीक गुजरता है लेकिन जब हम इनके निकट आते है और इन के बारे में धीरे धीरे जानते है तब हम  को पता लगता है कि ये अपनी मंज़िल नहीं थी और फिर हम इन को पाखण्डी,पोंगा पंडित आदि नाम से पुकारने  लगते  है जब कि इन्होने कोई अपराध किया ही नहीं ये तो वस्तुतः प्रोफेशनल (व्यवसायिक ) धार्मिक है ,व्यवहारिक नहीं।  इनका उद्देशय अपने श्रोताओ को रिझाना या प्रसन्न करना होता है न की प्रभु को।
          हरिद्वार गंगा घाट पर बैठे पुरोहितो में कौन सा पुरोहित प्रति दिन गंगा स्नान करता है कोई भी नहीं , आप पता करो वृंदावन के स्थानीय लोग बिहारी जी के दर्शन करने कब गए।  मेने अक्सर लोगो को रोष भरे शब्दों में कहते सुना है कि हम उज्जैन ,हरिद्वार ,वृंदावन,आदि स्थान पर गए वह पर पंडित लोग लालची है अरे भाई वो तो अपना धंधा कर रहे है और आप अपनी भक्ति।
           जो आप का भाव है वो उसका भाव नहीं है आप अपने विवेक और बुद्धि से काम लें।  माना आप एक कमीज़ खरीदने बाज़ार लेने गये दुकान दार आप को कई रंग और डिजाइन दिखता है आप लेते उसी को हो जो आप को ठीक लगता है.  आप से चूक  हुई नहीं के उसने आप को गलत माल दिया नहीं आप को सावधान रहना चाहिए। 
            फलस्वरूप ये लोग अपने भक्तो को ये बताते ही नहीं कि आप की मंज़िल मै नहीं हूँ।  मै तो केवल अल्प हूँ ,आप की मंज़िल तो वो असीम करूणानिधान, आनंद कन्द, परमानन्द है,  क्यों की यदि ये बात बता दी तो फिर उनकी दुकान कैसे चलेगी. यह बात मेँ यहाँ सभी के बारे में नहीं कह रहा , यहाँ जिक्र केवल उन भक्तो का हो रहा है, जो सिर्फ कथा वाचको, भजन गायको, तांत्रिको, आदि को ही अपना गुरु या भगवान्  मान बैठे है और अपना आर्थिक व् पारिवारिक नुकसान कर बैठते है और समाज में हसी का पात्र बनते है।
          प्रायः देखा गया है, ये प्रभु के व्यापारी केवल अपने प्रचार तक ही सीमित है।  इनको केवल मंच, माइक, माला, और माया ही चाहिए इनका भजन ,जप, ध्यान ,योग, यज्ञ , साधना आदि से कोई लेना देना नहीं। आप इन के जितने करीब जाओगे आप को उतनी ही गंदगी दीखेगी।  कथा, या भजन संध्या की पेमेंट को ले कर, आश्रमों की राजनीति  आदि विषयो पर जब ये बात कर रहे हो तो इनका असली रूप देखा जा सकता है।
                        यदि आप इन को सुनते है तो खूब सुनिए, उस पर अमल करने की कोशिश करें ,ये क्या बोल रहे है, इस पर ध्यान रखने की ज़रूरत है।  ये क्या कर रहे इस और नहीं जाना है क्यों की ये भी सांसारिक जीव ही है।                 इन से रिश्ता केवल श्रोता और वक्ता का ही रखें। अपना समर्पण केवल ईश्वर के प्रति  ही हो अपना ध्यान केवल सतकर्म सदव्यवहार सद्चिन्तन में ही रहे।  न की इन के प्रति।  जो आप को अपने से जोड़ने का  प्रयास  करे उस से सावधान होने की ज़रूरत है । ध्यान रहे  हम को असीम से जुड़ना है ,अनन्त से जुड़ना है , अल्प से नहीं  जो खुद अपूर्ण है, वह  हमारी मंज़िल नहीं हो सकता।  कथा कीर्तन करना उसका बिजनेस है भक्ति नहीं , माथे पर तिलक, धोती, कुर्ते माला, झोली, आदि आदि तो केवल दिखाने  भर के लिए है।  क्यों कि सफारी सूट या जींस टी शर्ट पहन कर भजन या कथा के कोई एक लाख रूपये नहीं देगा।  बेचारे श्रद्धावान लोग इसी परिवेश को देख कर ठगे जाते है।
                 मैने कई कथाओ व्  भजन संध्याओ में लोगो को झूमते नाचते देखा कई लोगो से बात भी की।  एक कथावाचक जिन से मेने पूछा की आज आपने मीरा बाई के बारे में बताया , कृपा  भक्ति मार्ग में कोई अपना अनुभव बताओ वह  चुप हो गए कोई जवाब नहीं था उन के पास।  मैने अपने पास से एक कीट नाशक दवा की शीशी में से नकली ज़हर निकल कर उन के आगे रखा और कहा लीजिये ये प्रभु का प्रसाद है स्वीकार करें
तो वह  तुरन्त गुस्से में बोले  झूठ बोलते हो ये तो ज़हर है , शायद मेरे पत्रकार होने से मेरा अपमान नहीं हुआ।  मैने  विनम्र भाव से कहा जब मीरा बाई बच गई तो आप क्यों नहीं बचोगे। मेरा इतना कहते ही वो सच बोल गए कि मै मीरा बाई नहीं हूँ।  जो बच जाऊंगा में तो भाई साहब केवल कथा वाचक हूँ  भक्त नहीं।
             कहने का अर्थ बिल्कुल सीधा है  अपनी सद बुद्धि का प्रयोग करें , अपने हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ भी पढ़े, संतो के दुलर्भ अनुभव एकत्र करें।  साधना करे।  सोशल मिडिया पर लोग को अपनी लोकेशन वृंदावन डाल कर खुद को भक्त बता कर अपने ही हाथो अपनी पीठ थपथपाते देख कर हसी आती है।  बिहारी के दर्शन १५ मिनट और लस्सी ,टिक्की, बाजार, चाऊमीन ......... में  चार घण्टे।  कोई एकांत वास नहीं , भजन नहीं, कोई ग्रंथ नहीं ख़रीदा रज को प्रणाम नहीं , धाम की कोई मर्यादा का पालन नहीं, सिगरेट सुलगते ,पान की पिचकारी मरते खुद को भक्त बताते लोग शायद ऐसे ही पोंगा पंडितो के शिष्य है। अन्यथा यदि कोई संस्कार वान सद गुरु मिल गया होता तो ये हश्र न होता।  और कार में बैठे और आ  गए घर।
            इसी लिए आप से निवेदन है खुद को भीतर से धार्मिक बनाने की आवश्यकता है बहार से नहीं ,क्यों कि हम जितना धार्मिक दिखाई देते है उतने धार्मिक है नहीं और जिस दिन,जिस क्षण हम भीतर से बदल गये फिर जो होगा वो अच्छा ही होगा ,असीम से जुड़िये , अल्प से नहीं।  अपना निशाना केवल मछली की आँख पर ही रखें ।  ध्यान केवल मंज़िल की और यदि  पगडंडिओ में भटक गये तो फिर मंज़िल मिलना बहुत कठिन होगा ।
                         
अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखे और शेयर करना न भूलें।
शेष फिर। .........नमस्कार
  

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