बालकों का भावनात्मक विकास करें
आज प्रायः समाज का हर व्यक्ति अपनी सन्तान के भविष्य की चिंता से ग्रस्त है। बच्चों की शिक्षा उनका रहन सहन उन की सोसायटी खान पान आदि आदि। जितना बड़ा नगर उतनी बड़ी चिंता, अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए माता पिता दोनों एड़ी छोटी का ज़ोर लगा रहें है। मैने यहाँ तक देखा है कि पिता का पूरा वेतन बच्चो की शिक्षा पर खर्च होता है और माँ की सेलरी से घर और बाकी खर्च पूरे होते है। ऐसी मिसालें महानगरों में भरी पड़ी है। आधुनिकता की अंधी भागम भाग जो बच्चों के लिए ही हो रही है उन के पास उनके लिए ही वक़्त नहीं है घर में खुशियों का सब साजो सामान सजा कर बैठ गए और हसने के लिए वक़्त नहीं। बच्चे शिक्षित तो हो रहे है, मगर विद्या वान नहीं। ज़रा सी बरसात क्या हो गयी इमारतें गिरने लगी क्या इन को बनाने वाले इंजीनियर नहीं थे, अनपढ़ थे क्या वो शिक्षित नहीं थे जो वो बता पाते कि बिल्डिंग में कितना सरिया और कितना सीमेंट लगेगा।...